अनिल के पिता कि शहर में बहुत अच्छा कारोबार , लेकिन अनिल हर समय आवारा दोस्तों के साथ घूमता रहता , पिता को ना तो व्यापार में मदद करता , ना उनकी कोई बात सुनता समझता । इसीलिए कोई भी उसे पसंद ना करता ।
अनिल के पिता को हार्ट अटैक आया ,और वो कुछ पल के मेहमान ।
पापा मैंने आप को बहुत सताया , मुझे क्षमा कर दें , बस आप ठीक हो जाएं , आप जैसा कहेंगे , मैं वैसा करूंगा , आप की हर बात सुनुंगा ।
बेटा मेरा बचना मुश्किल है , मेरा समय शायद पूरा हो चुका ।
लेकिन अगर तुम मेरी अन्तिम इच्छा पूरी करदो तो मेरी आत्मा को शांति मिलेगी ।
मुझसे बहुत बड़ा अपराध हुआ , मैने जीते जी आपकी सेवा -सुशुर्षा नही की लेकिन अब मैं समझ गया हूं कि माता-पिता की सेवा ही परमोधर्म है , जो आप कहेंगे मैं करूंगा , और आप से वादा करता हूं कि मां की सेवा करूंगा ।
जब मेरी मृत्यु हो उस माह में 15 दिनों तक मेरे पसंदीदा पकवान बना कर सभी रिश्ते-नाते , दोस्तों एंव फैक्ट्री के सभी काम करने वालों को खिलाना ।
अनिल ने पिता की मृत्यु के पश्चात हर साल यही किया , और हर एक को यही कहता कि जीते जी जिसने मां- बाप की सेवा कर ली उसे ये सब करने की भी आवश्यकता नहीं , सभी खाते और आशीश देते , इस तरह से उसका जीवन बदल गया और वो सबका एक अच्छा दोस्त , अच्छा इन्सान , वर्कर के लिए अच्छा मालिक बन गया ।अर्थात आज के पढ़े-लिखे लोग कहते हैं कि जो हम खाना , कपड़ा या पैसे देते हैं , क्या वो हमारे पुर्वजों के पास पहुंचते हैं , वहां के लिए कोई कोरियर सर्विस है क्या ।
सही है वहां कुछ नहीं पहुंचता ये जो कुछ हम करते हैं , अपना पूण्य इकठ्ठा करते हैं ।
हम जो भी खाना , कपड़ा इत्यादि देते हैं , वो हमारे पितरों तक तो नहीं पहुंचता , लेकिन इससे किसी भूखे को खाना मिल जाए , किसी ज़रूरत मंद की ज़रूरत पूरी हो जाए , उससे हमें भी सुकून मिलता है , लेने वाला आशीश देता है , और अच्छा काम करते देख हमारे पितृ भी खुश और आन्नदित रहते हैं ।
लेकिन इससे उत्तम कार्य ये है कि हम जीते जी ही माता पिता को खुश रखे तो उससे बढ़ कर कोई पुण्य नहीं ।
🙏मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर )
