
छंद मुक्त गीत
शीर्षक –“मैं बांसुरी बन जाऊं”
मैं सोचती हूं मन में, झूला तेरा बनाऊं |
ओ सांवरे! कन्हैया, उसमें तुझे झुलाऊं|
तुझको निहारू हर पल, तेरी प्रीत में रम जाऊं|
तुम बांसुरी बजाओ, मैं गीत गुनगुनाउ|
श्रृंगार तेरा करके, तुझे ओढ़नी ओढाउ|
राधा के जैसे मैं भी , तेरी प्रीत में खो जाऊं|
तेरी नजर मैं उतारु,टीका तुझे लगाऊं|
तेरे बाल रूप का मैं, मनोहर छवि निहारु|
तेरा सांवला सलोना, सा रूप मुझको भाए|
जी चाहता है मेरा, माखन तुझे खिलाउ|
है रीत की तमन्ना ,मैं बांसुरी बन जाऊं|
तेरे होठों से लिपट कर ,भक्ति की तान गाऊं|
लेखिका या रचनाकार रीता तिवारी “रीत”
अध्यापिका, स्वतंत्र लेखिका एवं कवियत्री
एम ए समाजशास्त्र, बी एड ,सीटीईटी उत्तीर्ण,
पिता का नाम श्री अवधेश तिवारी
मऊ, उत्तर प्रदेश से—-