हिंदी को हिंदी रहने दे, मजाक न बनाये।
आज भारत की अपनी भाषा हिंदी का घोर अपमान हो रहा है।हमारे देश के कुछ तथाकथित ज्यादा पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी वर्ग ही हिंदी का अपमान करने पर तुले हुए हैं।अभी हाल ही में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने ट्विटर पर मास्क का हिंदी रूपांतरण बताया।उन्होंने इसके लिए”नाशिकामुखसंरक्षक किटाणुरोधक वायु-छानक वस्त्रडोरीयुक्तपट्टिका” शब्द का प्रयोग किया।अब मास्क शब्द की इतनी -लंबी-चौड़ी हिंदी का प्रयोग आमजनों में अथवा सरकारी कार्यालयों में तो नही ही होती है।ये हिन्दी के साथ एक भद्दा मजाक है।हिंदी के विख्यात कवि हरिवंश राय बच्चन, जिन्होंने हिंदी भाषा की आजीवन सेवा करते रहे।उनके पुत्र जब माँ हिंदी का इस तरह से अपमान करते हैं तो यह शोभनीय नही हो सकती।हमें इसकी भर्त्सना करनी चाहिए।
आइए अब हम आपको हिंदी के कुछ ऐसे ही शब्द से परिचय कराते हैं, जिन्हें आज के तथाकथित विद्जन जबर्दरस्ती के हिंदी रूपांतरण कर रखा है।जैसे रेलगाड़ी को “लौह पथगामिनी” ,रेलवे स्टेशन को “धूक-धूक मंडल” ,क्रिकेट को “चट्टक-पट्टक”, बटन को “चतुष्छिद्रिकचक्रिका”,सिगरेट को”धूम्रदण्डिका” ,रिक्शा को”त्रिचक्रवाहन” इसके अलावा विज्ञान में कार्बन टेट्रा क्लोराइड के लिए” कृष्णकणचतुष्त्कतीक्षणांक्ष” इत्यादि ऐसे शब्द है जिनका बेमतलब का हिंदी रूपांतरण किया गया है।ऐसे शब्दों का हमें वास्तविक जीवन से कोई सरोकार नहीं है, कंही भी हम इसका प्रयोग नही करते हैं।इसे हम शुद्ध हिंदी कभी नही कह सकते,ये हिंदी के प्रति क्रूर मजाक हैं।जिसे आज के समाज अपनी अगली पीढ़ी को सीखा रही है।अगर हम मास्क को ”मास्क”,रेलगाड़ी को “रेलगाड़ी”,क्रिकेट को “क्रिकेट”,और सिगरेट को”सिगरेट” ही कहे तो इसमें क्या बुराई है?और अगर यही शुद्ध हिंदी होती तो रेलवे कार्यालयों में रेलगाड़ी की जगह लौहपथगामिनी शब्द का ही प्रयोग हो रहा होता किन्तु ऐसा नही है।मास्क को हम मास्क ही कहे तो बेहतर होगा, इसके लिए इतनी लंबी-चौड़ी शब्द की जरूरत नही है।कहते हैं भाषा हमारी माँ होती है, तो क्या हम अपनी माँ का इस तरह से अपमान कर सकते हैं।कदापि नहीं!
इसलिए कृपया हमारी हिंदी को हिंदी ही रहने दीजिए।यह भाषा किसी परिचय या सहारे की मोहताज नहीं है।यह तो आज दूसरी भाषा को सहारा दे रही है।आज यदि ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी में हिंदी शब्दों को मान्यता औऱ प्रवेश मिला है तो इस बात का द्योतक है कि हमारी भाषा में वो प्रेरणा है, जिससे विश्वपटल पर शान से खड़ी हो सके।आइये इस भाषा की वंदना करे औऱ यह प्रण करे कि इसके सही प्रयोग को प्रोत्साहन देंगे औऱ जँहा इसको गलत लिख कर इसका अनादर होगा।वँहा हम सशक्त और सार्थक तरीके से विरोध दर्ज करेंगे।
राहुल राज, अमता, दरभंगा, बिहार।