हिंदी और उसकी बोलियाँ: जन जन की बोलियाँ
‘‘चार कोस पर पानी बदले आठ कोस पर बानी‘‘ एवं इसी संदर्भ में कबीरदास की प्रसिद्ध पंक्ति है – ‘‘संस्किरित है कूप जल, भाखा बहता नीर।‘‘ इससे अनुमान लगाया जा सकता है हमारे देश में कितनी बोलियां बोली जाती हैं। स्पष्ट है कि हिंदी को संपन्न बनाने में इन बोलियों की विशेष भूमिका रही है ।हिन्दी का विकास क्रम-संस्कृत→ पालि→ प्राकृत→ अपभ्रंश→ अवहट्ट→ प्राचीनध्प्रारम्भिक हिन्दी मानी जाती है । हिन्दी साहित्य का विकास आठवीं शताब्दी से माना जाता है । हांलाकि इसकी जड़े प्राचाीन भारत के प्राचीन ‘संस्कृत‘ भाषा में तलाश की जा सकती है । किंतु हिन्दी साहित्य की जड़े मध्ययुगीन भारत के छोटे-छोटे क्षेत्रों में बोली जाने वाली बोलियों में पाई जाती हैं । मध्यकाल में ही हिन्दी का स्वरूप स्पष्ट हुआ तथा उसकी प्रमुख बोलियाँ विकसित हुई । हिन्दी के मुख्य दो भेद पूर्वी हिन्दी एवं पश्चिमी हिन्दी स्वीकार किये गये हैं । पूर्वी हिन्दी के अंतर्गत अर्धमागधी प्राकृत स्वभाव के अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी को रखा गया है। पाश्चात्य हिन्दी के अंतर्गत पांच बोलियां -खड़ी बोली, बांगरू, ब्रज, कन्नौजी, और बुंदेली स्वीकार किये गये हैं । इनके अतिरिक्त बिहारी, राजस्थानी एवं पहाड़ी हिन्द प्रदेश की उपभाषाएं (बोलियां) स्वीकार की गई हैं । गैर हिन्दी भाषीय क्षेत्र में बोली जानी वाली हिन्दी बोली में – बम्बईया हिन्दी, कलकतिया हिन्दी एवं दक्खिनी हिन्दी भी सम्मिलित है । हिन्दी जिस भाषा समूह का नाम है, उसमें आज के हिंदी प्रदेशध्क्षेत्र की 5 उपभाषाएँ तथा 17 बोलियाँ शामिल हैं। वस्तुतः इन बोलियों या उपभाषाओं को हिन्दी भाषा की बोली या उपभाषा मानने के पीछे इन सबकी परस्पर सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनितिक एकता के साथ-साथ परस्पर बोधगम्यता, शब्द-वर्ग की समानता तथा संरचनात्मक साम्य है ।
हिन्दी की बोलियां अपने साथ एक बड़ी परंपरा एवं सभ्यता को समेटे हुये हैं। तुलसीदास द्वारा ‘अवधी‘ में रचित ‘रामचरित मानस‘, सूरदासजी द्वारा ‘ब्रजभाषा‘ में रचित ‘सूरसागर‘ मीरा बाई का राजस्थानी एवं ब्रजभाषा में साहित्यिक उपादान ‘बरसी का मायरा‘ एवं ‘गीत गोंविंद टीका‘, विद्यापति के मैथली की रचनाएं आदि आज हमारी साहित्यिक धरोहर हैं।
कुतुबन (मृगावती), जायसी (पद्मावत), मंझन (मधुमालती), आलम (माधवानल कामकंदला), उसमान (चित्रावली), नूर मुहम्मद (इन्द्रावती), कासिमशाह (हंस जवाहिर), शेख निसार (यूसुफ जुलेखा), अलीशाह (प्रेम चिंगारी) आदि सूफी कवियों ने अवधी को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। बैसवाड़ी अवधी में गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित ‘रामचरित मानस‘ ने हिन्दी साहित्य को नई ऊंचाई पर पहुॅचाया । सूरदास (सूरसागर), नंददास, निम्बार्क संप्रदाय के श्री भट्ट, चैतन्य सम्प्रदाय के गदाधर भट्ट, राधावल्लभ सम्प्रदाय के हित हरिवंश एवं सम्प्रदाय निरपेक्ष कवियों में रसखान, मीराबाई आदि प्रमुख कृष्णभक्त कवियों ने ब्रजभाषा के साहित्यिक विकास में अमूल्य योगदान दिया ।खड़ी बोली का आदिकालीन रूप सरहपा आदि सिद्धों, गोरखनाथ आदि नाथों, अमीर खुसरो जैसे सूफियों, जयदेव, नामदेव, रामानंद आदि संतों की रचनाओं में उपलब्ध है। हिंदी एक ऐसा गुलदस्ता है जिसमें एक पुष्प अवधी तो दूसरा ब्रजभाषा का है । इस गुलदस्ते से कभी खड़ी बोली की सुगंध आती है तो कभी बुंदेली, छत्तीसगढ़ी और कभी दक्खिनी महकती है।
सुश्री मनीषा रानी वर्मा
शिक्षा निदेशालय दिल्ली