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सुखमिला अग्रवाल

हिन्दी कैसे जन जन तक पहुँच सकती है, विषय पर मेरे विचार..एक आलेख…
✍️आज वातावरण में मधुर सी महक है।
आज हिन्दी दिवस की चारों ओर अभिव्यक्तियों,
विचारों,वक्तव्यों की छटा
बिखर रही है।
यहाँ समझने वाली बात ये है किआखिर क्यूं हम हिन्दी को उसका दर्जा जिसकी वो हकदार है, दिलवाने में असमर्थ हैं।क्या इसके कारणों पर हमने विचार कियाहै.,?
आपने भी महसूस किया होगा,कि केवल विचार रखने व लिखने से जो बात हम कहते हैं,उसका उतना असर नहीं होता,जितना हम व्यवहार में अपनाकर उसके लाभ और हानि से परिचित होकर अपना अनुभव बताते हैं, तब उसका असर बहुत ज्यादा होता है।क्योंकि हम प्रत्यक्ष अनुभव से गुजरते हैँ।
हम सभी चाहते हैं, हिन्दी को विश्व में सम्मान प्राप्त हो। लेकिन हम सब अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढाते हैं। परिणाम क्योंकि स्कूल वाले यही माँग करते हैं कि बच्चे से ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी में बात करो, नहीं तो पीछे रह जायेगा।यद्यपि हमारे घरों में हिन्दी का वातावरण रहता है, इसलिये हमें ज्यादा ध्यान देकर अंग्रेजी पर जोर देना पडता है। इसका प्रभाव हमारी आने वाली पीढी पर स्पष्ट देखा जा सकता है।आज स्थिति ये है कि हमारे बच्चे हिन्दी बहुत कम जानते हैं,और अंग्रेजी फर्राटेदार बोलते हैं, अंग्रेजी प्रतिष्ठा का विषय लगता है।
और हम माता पिता बच्चों को अंग्रेजी बोलते देख फूले नहीं समाते हैं।
बहुत से देश ऐसे हैं जिन्होंने अपनी भाषा के साथ बहुत तरक्की की है।
जैसे जापान,फ्राँस,
जर्मनी आदि।
जरा कल्पना करके देखिये,आने वाले समय में हिन्दी का क्या भविष्य रहेगा।क्या हमारी तरह आने वाली पीढी हिन्दी के सम्मान के लिये संघर्ष करेगी.?
हमारे दिमाग में यह बात घर कर गयी है कि अंग्रेजी माध्यम में नहीं पढाया तो हमारा बच्चा दुनियाँ के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पायेगा।
आज के दौर में ये कुछ सीमा तक सही भी हो..!लेकिन विचारणीय है कि मातृभाषा के अलावा कोई भी भाषा हम कुछ बडे होने पर अच्छी तरह सीख सकते हैं, लेकिन मातृभाषा अगर बचपन से नहीं सीखी तो कोई भी उसकी आन्तरिक सुन्दरता से न केवल वंचित रहेगा वरन् कुशलता से सीख भी नहीं पायेगा । क्योंकि बाद में न समय रहता है ना ईच्छा ।हिन्दी भाषा संस्कृत के बाद सबसे समृद्ध व वैज्ञानिक भाषा है,
क्योंकि हर भाव की अभिव्यक्ति के लिये सैंकडों शब्द हमारी भाषा में मौजूद हैं।अगर हम पैदा होने से लेकर नहीं सीखते हैं तब हम कदापि हमारी भाषा की आत्मा में प्रवेश नहीं कर सकते।
भारतेन्दु हरिशचन्द्र जी ने कहा है ..
“निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटै न हिये के शूल”
अर्थात्, मातृभाषा की उन्नति के बिना किसी भी समाज की तरक्की सम्भव नहीं है।
इसलिये वक्त रहते विचार करें। घर का माहौल ऐसा बनायें कि बच्चों को हिन्दी बोलने समझने में दिक्कत न हो, बल्कि फक्र महसूस करें। तभी सही अर्थों में हिन्दी को सम्मान दे पायेंगे
कोई भी भाषा सीखना गलत नहीं है । प्रश्न ये है कि हमारी मातृभाषा जिसका इतना समृद्ध ‘बोलियों’ रूपी परिवार है,का अस्तित्व खतरे में नहीं पडना चाहिये ।इससे ही हमारी व हमारे देश की पहचान है।
अन्त में अपनी स्वरचित दो पंक्तियाँ यहाँ देना चाहूँगी
“हिन्दी का आदर करें,
और करें इसका सम्मान,
भारत के दिल में बसी ,
सहज सुवज्ञ सुजान।”
✍️सुखमिला अग्रवाल
मुम्बई,

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