
दिनांकः ०१.११.२०२०
दिवसः रविवार
विषयः चित्राधारित
शीर्षकः हो बेटी निर्बाध
देखो कलियुग कालिमा ,फैला है व्यभिचार।
निशिदिन मरती बेटियाँ , लाचारी सरकार।।१।।
लव ज़िहाद के नाम पर, परिवर्तन नित धर्म।
फाँस रहे मासूम को , प्यार नाम दुष्कर्म।।२।।
भोली भाली बेटियाँ ,फँसती झूठा प्यार।
बेच रही निज अस्मिता, धोखा हत्या हार।।३।।
अद्भुत है निर्लज्जता , असंवेदित भाव।
पागलपन हिंसक प्रकृति , खल कामी दे घाव।।४।।
मति विवेक चिन्तन विरत, पशुता है आचार।
निर्भय हैं वे मौत से , आदत से लाचार।।५।।
शासन से निर्भीत हो , भाव दनुज शैतान।
नोच रहे हैं बेटियाँ , गिद्ध श्वान हैवान।।६।।
सुसंस्कार सन्तान को , भूला जन दायित्व।
भौतिकता मदमत्त जन,खोया निज अस्तित्व।।७।।
स्थापित परिणय प्रथा , संस्कार निर्दिष्ट।
रक्षित थी नारी सुता , था चरित्र उत्कृष्ट।।८।।
अनुशासन की है कमी , विरत नार्य संकोच।
यौवन के मधुशाल में , बदली बेटी सोच।।९।
शिक्षा का मतलब नहीं , हो स्वभाव उद्दण्ड।
प्रेम जाल में फँस रही ,आहत जोश प्रचण्ड।।१०।
बचे तभी ये बेटियाँ , हो शिक्षण परिवार।
नीति रीति सम्प्रीति की, स्थापित शिक्षाचार।।११।।
असहनीय कानून बने , मिले सजा अपराध।
दुष्कर्मी रूहें कँपे , हो बेटी निर्बाध।।१२।।
कवि✍️डॉ. राम कुमार झा “निकुंज”
रचनाः मौलिक (स्वरचित)
नई दिल्ली