मेरा गाँव
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जो 'सपनें' हमनें बोए थे 'नीम' की ठंडी छाँव में ,
गया छुट रह गए अधूरे बीता बचपन जिस गाँव में!
खिली कली थी घर - आँगन मेरे बाग - बगीचे में,
कुछ 'पनघट' पर छुट गए कुछ कागज की नाव में!!
सावन की झड़ी ठिठकती 'सावन-भादो' मास में,
तकती राह सजती 'गलियां' मेरे आने की आस में!
खुद से अक्सर होती थी बातें बैठ 'पीपल' छाँव में,
सैर-सपाटे होती थी अक्सर टूटे लकड़ी के नाव में!!
घाट-घाट पर बजती पायल देखा अक्सर पाँव में,
दादी काकी माँ और बहने 'धूप' सुसताते छाँव में!
सूनी खलिहानों को तकती गौरैया निज भाव में,
गीतों की छूट रही 'परंपरा' जाने क्यूँ अब गाँव में!!
रूप रंग की भेद ;नहीं है गाँवों की 'स्वभाव' में,
ताल तलैया मलय पवन अब भी बसते हैं गाँव में!
जीवन देव बिताने आ जा 'पुरवईया' के छाँव में,
क्षण स्वर्णिम गंवा रहा है क्यूँ 'नगरों' के प्रभाव में!!
✍🏻 देवेन्द्र हिरवानी
कन्हारपुरी वार्ड नं 34
राजनांदगांव(छ.ग.)