हे प्रिये! हे! हृदय अभिलाषी
हे चंद्रमुखी! जग सुन्दरी !
हे मृगनयनी ! किरण प्रात: की
तू चमके है शबनम सी !!गाल गुलाबी अधर सूर्ख है
गेसू काले घन समान
मन हर्ष से पुलकित होता
तू कहे जब मुझको प्राण
कुसुम बदन पर ऐसे शोभे
बहार जैसे बसंत कीनित निशा तू स्वप्न में आती
प्रिये मंद मधु मुस्काती
ऐसा लगता सावन की है
उर बगिया ही खिल जाती
नैन अथक बस ताके तुझको
जब प्रीत मन लुभाये री !एक जन्म क्या अंत जन्म तक
मैं तेरा तू मेरी है
भाग्य-विधाता जो कुछ चाहे
जन्म न्यौछावर कोटि है
देव उर में राधिके ध्याये
जग सूचित कर जाऊं री!