मेरा बुढ़ापा
मेरा बुढ़ापा उस खिले पुष्प की तरह है,
पर वह पुष्प मुझसे भी अच्छा है,
मालिक स्वतः आकर मृत्यु दे जाता है,
और उसकी सुगन्ध की कीमत वसूलता है,
खरीदने वाले के ऊपर उपयोग निर्भर करता है,
पर मृत्यु के बाद भी सुगन्ध बिखेरता है ,
और मैं मृत्यु का इन्तजार थकते थकते करता हूँ ,
मृत्यु के पश्चात उन्हीं पुष्पों से सजाया जाता हूँ ,
इसलिए इन्सान को पुष्प को तरह ,
मुस्काने को कहा गया है ।।आदित्य कुमार श्रीवास्तव