सच कहूँ तो एक सी बातें कहानियों में पढ़ पढ़ कर और लोगों(स्त्रियों) से सुन सुन कर एक खीझ सी उत्तपन्न होने लगती है।विषय वही;सास ससुर तानाशाह हैं, सिर्फ अपनी पसंद थोपते हैं, दिन भर कोल्हू के बैल की तरह काम मे लगी रहती हूं,अपनी पसंद का खाए जमाना हो गया,सबका ख्याल रखते रखते खुद को ही भूल गयी,जीवन मे आत्मसंतुष्टि नही है, सारी पढ़ाई लिखाई आज बेकार हो गयी लगती है,जीवन नीरस है, घर मे कोई सपोर्ट नही करता,किसी को हमारी(स्त्रियों)की खुशी की परवाह नहीं, कितना भी कुछ करो,लोग सन्तुष्ट नहीं होते,पति ने नौकरी करने से मना कर दिया,बच्चे की वजह से नौकरी छोड़ दी,घर के कामो में कोई मदद करने वाला नहीं, घर के बाकी सदस्य(पति,बच्चे और अन्य लोग)काम मे हाथ बंटाने की बजाय काम को और फैलाते हैं,पति नही चाहते कि फेसबुक अकाउंट बनाऊं/फोटो अपलोड करूँ,उन्हें नही पसन्द की पश्चिमी परिधान पहनूँ,जिनके लिए दिन भर व्यस्त रहती हूं ,उन्हें ही इसकी कदर नहीं, जिनके लिए अपनी मनपसंद चीज कुर्बान की;वे ही आज ऐसा व्यवहार करते हैं ,सारे पति ऐसे ही होते हैं ;हिटलर,नुक्स निकालने वाले और अपनी बात मनवाने वाले आदि आदि।फेहरिश्त लम्बी है इन शिकायतों की।चाहे खीझ कितनी भी आए,ये कहीं न कहीं ये प्रदर्शित करता है कि 21वीं सदी में दो दशक बीत जाने के बावजूद भारतीय स्त्रियां अपनी स्थिति से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं।जब मैं लोगों को इस सम्बंध में कुछ समझाने की कोशिश करती हूं तो आमतौर पर यही जवाब होता है कि सबके पति तुम्हारे पति जैसे नहीं होते।बिल्कुल।लेकिन उससे ज्यादा सत्य ये है कि सबके माता पिता भी मेरे माता पिता की तरह नहीं होते और हर स्त्री भी मेरी तरह नहीं होती।आप आज कैसे हैं ;विनम्र,अक्खड़;डरपोक-साहसी;आत्मकेंद्रित-सबके बारे में सोचने वाले;आत्मविश्वासी-आत्मविश्वास से हीन आदि आदि इसमे आपके माता पिता का बहुत हद तक योगदान होता है।हालांकि व्यक्तिगत अंतर भी अपनी जगह हैं।तो आप आज अगर अच्छी स्थिति में नहीं हैं तो इसमें कुछ हद तक योगदान आपके माता पिता का भी है।अनजाने में ही लेकिन उन्होंने आपको सबल और सक्षम नहीं बनाया।
अब आते हैं समस्याओं पर।ससुराल वालों से इतने तल्ख रिश्ते रखने ,उनकी पीठ पीछे शिकायतें करने और सामने त्याग की मूर्ति बने रहने से बेहतर है कि आप अपने मन की बात,प्यार से उनके सामने रखें, उन्हें समझाने की कोशिश करें, न कि जीवन भर उनके प्रति मन में नकारात्मकता लेकर चले।हो सकता है उन्हें ये बात पसन्द ना आए,तो ये भी सच है कि हर स्थिति में सबको सन्तुष्ट कभी नही रखा जा सकता।आप एक कोशिश तो कर के देखें, कम से कम मन मे मलाल तो नहीं रहेगा।
अब आते हैं समस्या की ओर।अगर आपके पति आप के ऊपर नियंत्रण रखते हैं कि “ये मत पहनो,यहां मत जाओ,फेसबुक यूज मत करो,फोटो मत लगाओ,उससे बात मत करो,नौकरी मत करो आदि आदि तो ये आपकी गलती है।जब आप एक उम्र पर पहुंच जाए(18 वर्ष के बाद,तभी शादी होती है),तब किसी को ये हक नहीं आपसे कुछ जबरदस्ती करवाए।बस सलाह भर ही दे सकता है।फिर चाहे वो पति हो या कोई और।हालांकि पति शब्द ही अपने आप मे सही नहीं है।इसका शाब्दिक अर्थ होता है मालिक।बहरहाल,रिश्तों में कोई किसी का मालिक तो कदापि नही होता।परिपक्व हो जाने पर ये निर्णय आपका होना चाहिए कि नौकरी करें या नहीं?,क्या पहनें और कैसा जीवन जीएं।शर्त यही है कि आप अपने पति को भी किसी चीज के लिए बाध्य नहीं करेंगी।
अब आते हैं काम पर।ज्यादातर भारतीय पुरुष घर के कामों को हाथ तक नहीं लगाते।क्योंकि उस पीढ़ी की ज्यादातर माताओं ने उन्हें ये सीखाया ही नहीं है।उनका ध्यान तो बस किशोरावस्था से ही सिर्फ बेटियों को सीखाने पर रहा है।क्योंकि बेटियों को दूसरे घर जो जाना है।और उनके जीवन का अंतिम उद्देश्य पति नामक जीव को खुश रखना और प्रभावित करना है।बहरहाल,अब इन पतियों ने कभी बचपन से अपने काम तो ढंग से किये ही नहीं तो घरेलू काम क्या खाक करेंगे?इनके काम तो कभी इनकी मां, कभी बहनों ने किया है तो अब इनकी सारी उम्मीदें पत्नी से ही तो लगेंगी? इन्हें बदलना इतना आसान भी नहीं है।पर समझाने पर ये भी जरूर समझ जाएंगे।आखिर हैं तो इंसान ही?
तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि पति अगर काम करना भी चाहें तो महिलाएं खुद ही नहीं करने देती।या फिर उनके किये काम को बुरा बता कर फिर खुद ही करती हैं।ऐसी स्थिति में भला कौन और क्यों कोई काम करना चाहेगा?कुछ स्त्रियों ने बंटवारा कर दिया है कि बाहर के काम तुम करो और घर के मैं।लेकिन बंटवारे के बावजूद वे खुश नहीं हैं और सभी पति ऐसे ही होते हैं कह कर उन्हें ताने भी देती हैं।आप भी बाहर के काम करो और उन्हें भी घरेलू काम करने दो।ये भला क्या बात हुई?कुछ स्त्रियां तो उन्हें एक गिलास पानी तक खुद हाथ से लेने नहीं देती,ताकि वे उनपे पूरी तरह निर्भर रहें और तारीफें करें सो अलग।निर्णय आपको करना है।सिर्फ तारीफें चाहिए या आप उनका भला भी चाहती हैं?भलाई चाहती हैं तो उन्हें आत्मनिर्भर बनाएं।
यही बात बच्चों पर भी लागू होती है।बचपन से उन्हें अपने काम खुद करने की आदत डालें।इससे जहां एक तरफ वे आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर बनेंगे,आपका भी लोड कम होगा।
स्त्री हो या पुरुष।तमाम जिम्मेदारियों के बीच अपना” मी टाइम” जरूरी होता है।इसमें वे अपनी पसंद की चीजें करें।बिना किसी व्यवधान के साथ।बच्चे जब तक छोटे हों,बारी बारी से सम्भाले।जब बीमार हो तो पिता की जिम्मेदारी बस डॉक्टर को दिखाने तक ही सीमित न हो।जब हम कुछ टाइम खुद के लिए देंगे तो वो न केवल हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा,वरन हम फिर से तरोताजा भी हो जाते हैं।अपने साथ साथ अपने स्पाउस का भी ख्याल रखें।कुछ औरतें चाहती हैं कि उनके हब्बी बस उनके साथ ही रहें फ्री टाइम में।ऐसा कहाँ तक उचित है?हमसे इतर उनके दोस्त,परिजन और परिवार के लोग भी तो हैं?उनकी भी कुछ अपेक्षाएं हैं।अब पुरुष को चाहिए कि कैसे सभी रिश्तों के साथ न्याय करते हुए तालमेल बैठाए।बिना किसी को उपेक्षित किये।
सार यही है कि सबको ये हक है और आवश्यकता भी कि काम के साथ साथ अपना पसंदीदा खाना खाए, घूमे फिरे ,अपने शौक पूरे करे।किसी और के हिसाब से पूरी जिंदगी जीने से मलाल के अलावे कुछ नही मिलेगा।जीवन आपका है और उसे खुश रखने की जिम्मेदारी भी आपकी।भरसक इसे नकारात्मकता से दूर रखें और किसी भी बात को पूरी तरह से जाने बिना उसका सामान्यीकरण भी ना करें।स्वाति
