मार्ग में
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प्राची में सूरज निकले
दिन भर कर्तव्य निभाने को
जीवों में हुआ हलचल
दाना पानी पाने को ।सोई थी जो कलियां रात भर
खिली उष्णता पाकर के
नलिन बीच जो रहा था भंवरा
उठा वह भी घबरा करके ।चिड़ियों ने अब पंख पसारे
किए फुदककर हल्के व्यायाम
कंठ खोलकर राग को परखा
निकल गए फिर करने काम ।टपक रही हैं शीत की बूंदे
बिखर रही है बनकर नीर
देकर ताजगी जीवन को
बह रहा है मंद समीर।देख कर सब को कामों पर
मर्कट भी अब हुए अधीर
उछल कूद करते डालो पर
कला दिखाते कला प्रवीर ।ऐसी थी प्रातः मंगल बेला
चला उस में रथ अकेला
बैठे थे युगल पथिक
हास्य विनोद करने वाले
चुपचाप थे आज रसिक ।✍रवि शंकर पाण्डेय ✍
रंका बौलिया ,गढ़वा
झारखण्ड
