
युवा देश के कर्णधार होते हैं ।देश के भविष्य की बागडोर युवाओं के हाथ में होती है क्योंकि युवाओं में होता है जोश,तमन्ना और उसको साकार करने का दम।
आज की शिक्षानीति ,संस्कृति और मानव मूल्यों में ह्रास तनाव के मुख्य कारण हैं। शिक्षा का व्यवसायीकरन हो रहा है ,शिक्षा मानवीय मूल्यों से नहीं पैसों से तौली जा रही है। परिणाम ये हो रहा है कि पैसे वाले अपने बच्चों को हमेशा अग्रिम पंक्तियों में ही देखना चाहते हैं। पूर्णांक से एक अंक भी कम आने पर अभिभावक को लगता है कि मेरा बच्चा दूसरों की अपेक्षा ख़राब है । उनको लगता है कि अब अपने पड़ोसियों ,यहाँ तक अपने रिश्तेदारों में इनकी इज़्ज़त ही कम हो जाएगी और यहीं से बच्चों पर अनावश्यक तनाव घर करने लगता है।
दूसरी ओर जितने हाथ हैं उनके लिए देश में काम नहीं है या यों कहें कि उस तरह की शिक्षा नहीं दी गयी कि ये सब ख़ुद अपने लिए रचनात्मक कार्यों का निर्माण कर सकें।
सारी कमियाँ मिलकर युवाओं को अपने भविष्य की ओर से चिन्ताएँ बढ़ा देती है और जो युवा ऐसी परेशानियों का सामना करने में अक्षम होते हैं वे आत्महत्या तक कर लेते हैं ।
अभिभावकों को भी अपनी महत्वकांक्षा सीधे अपने बच्चों पर नहीं डालनी चाहिए। हर इंसान को भगवान हर गुणों से पूर्ण या वैसी क्षमता नहीं दिए हैं। हर बच्चों का स्वभाव,मानसिक क्षमता और पसंद अलग अलग होता है। ना हर बच्चा डॉक्टर बन सकता है और ना हर बच्चा किसान।
ये समज में जो बलात्कार की,ऐसिड अटैक की घटनाएँ लगातार बढ़ रही है,नशा का प्रचलन दिनों दिन जो बढ़ रहा है , इन सबके पीछे मानसिक तनाव का ही योग होता है।
अब बात आती है कि ये सब तो ठीक है पर इसके सुधार के लिए करें क्या ?
१.अभिभावक को ख़ुद अपने में बदलाव करना होगा ।
२.घर की संस्कृति में सुधार करना होगा।
३.योग को दैनिक क्रिया में अपनाना होगा।
४.शिक्षा नीतियों में सुधार करना होगा।
५.अध्यात्म को अपने घर की दिनचर्या में जोड़ना होगा।
=============
©कुमार @शशि
©स्वरचित ,अप्रकाशित और मौलिक।