लघुकथा
शीर्षक- !
शादी के सात बरस हो जाने पर भी रधिया संतान सुख से वंचित थी| लाख कोशिशों के बाद अब माँ बनने की आस भी छोड़ चुकी थी|गाँव में अपने बाँझपन के ताने सुन-सुन कर तो उसके कान ऊब चुके थे लेकिन उसके मन में भगवान के प्रति श्रद्धा व विश्वास तनिक न डगमगाया था|एक दिन पूजा करके घर की ओर वापस आ ही रही थी कि रास्ते में एक झाड़ी के पीछे से किसी नन्हे बच्चे के रोने की आवाज सुनाई पड़ी| रधिया तेज-तेज कदमों से भागती हुई उस ओर पहूँची तो देखा कचड़े के ढे़र पर एक कूट के डब्बे में नवजात कन्या जो शायद कुछ घंटे पहले ही जन्मी हो, जोर-जोर से रोए जा रही है|यह देख रधिया उसे झट-पट उठा अपने सीने से लगा लिया और उससे भी तेज कदमों से घर की तरफ भागी|खुशी के आँसु साथ बह रहे थे,उसे ऐसा लग रहा था,शायद भगवान ने उनकी प्रार्थना सुन ली|नारी तो दोनों ही थी, एक बच्ची जन कर फेंकने वाली और दूसरी उसे गोद में भर कर अपना ममत्व लुटाने वाली|लेकिन माँ थी तो सिर्फ रधिया |