युधिष्ठिर का राज्यारोहण
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युद्ध की विभीषिका समाप्त हुई
युधिष्ठिर के सर ताज सजा
संग सभासद हस्तिनापुर में
धर्मपुत्र का राज सजा ।पाकर एक विजय महान
दर्पित थी उनकी मुस्कान
करके ऋषि-मुनियों को दान
हर्षित था राजन का प्राण ।किंतु स्वजनों को न पाकर कर समीप
खिन्न थे सत्यवादी महीप
यह विजय था उनका उत्थान
या पराभव का कुटिल मुस्कान ।खोकर प्रिय पितामह को
यह कैसा राज्य उन्होंने पाया
इसी राज्य के लिए उन्होंने
गुरु द्रोण को भी ठुकराया ।देकर यह महामाया
कृष्ण भी जाएंगे अपने धाम
किसके लिए मैं राज करूंगा
कौन आएगा मेरा काम
विचारों के इस झंझार में
पड़े थे निविड़ अंधार में ।तात धृतराष्ट्र और विदुर भी
गमन करेंगे वानप्रस्थ
अनाथ रह जाएगा
हस्तिनापुर और इंद्रप्रस्थ✍रवि शंकर पाण्डेय ✍
रंका बौलिया, गढ़वा
झारखण्ड
