कहानी के रुप में मेरी पहली रचना है कृपया पढ़कर समीक्षात्मक टिप्पणी करने की कृपा करें ।
(कहानी)
ऐसी पढ़ाई का क्या फायदा
———————
दोपहर होने को है पर अभी तक सोहराई साव मुंह नहीं धोए हैं, सुबह के सैर से लौटने के बाद घर के बाहर पड़ी तख्त पर जो चुपचाप बैठे हैं सो बैठे हैं ।
आजकल तीन-चार दिनों से कुछ ज्यादा ही चिंतित रहने लगे हैं।
गैस्ट्रिक,सुगर व हाई बलड प्रेसर के मरीज हैं, डॉक्टर ने ज्यादा देर खाली पेट नहीं रहने की सख्त हिदायत दे रखी है, पर मन जब दुखी हो तो आदमी स्वास्थ्य की चिंता कहां करता है ।पत्नी ‘कोशिला ‘घंटों पहले दातुन- पानी रखकर जा चुकी है । पोता बार-बार दरवाजे की ओट से झांक झांक कर बाबा को देख रहा है ,और अंदर जाकर अपनी दादी को इसकी सूचना दे रहा है ।
थोड़ी देर बाद घर से कोशिला और गुरु बाबा नगेसर दास
जो तीन दिन से यजमानी का आनंद उठा रहे हैं बाहर आए ।(सोहराई साव और गुरु बाबा के बीच एक अजीब रिश्ता है जहां गुरु बाबा को देखते ही सोहराई साव की त्योरियां चढ़ जाती हैं और वे दूसरी तरफ देखने लग जाते हैं ,वही गुरु बाबा बिना मांगे ही अपने शिष्य को सलाह देने से नहीं चूकते ।
गुरु बाबा की टिपोरी सोहराई साव को फूटी आँख नहीं सुहाती और पुत्रवधु है कि आतिथ्य सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती, सोहराई साव घर में इस विषय पर आपत्ती जता भी चुके हैं ,वह एक पल भी गुरु बाबा को घर में नहीं देखना चाहते थे ।
कोशिला अपने पति की गुरु बाबा के प्रति बेरुखाई को अपनी वाकपटुता और अपने स्वभाव से ढँकने का सफल प्रयास करती रहती थी ।)कोशिला ने ढिठाई पूर्ण आग्रह के साथ कहा- उठिए मुंह हाथ धोइए – – – जो नहीं कमाता है भगवान उसका भी दिन पार लगाते हैं।
आप बहुत कमाए अब बैठकर खाने का समय आ गया । मिंटू अपना बाल बच्चा देखे, सब दिन हम ही लोग नहीं करते रहेंगे । गुड्डूआ अपना कर ही न रहा है, क्या चीज की कमी है उसके पास ।( सोहराई साव के दो बेटे हैं मिंटू और गुड्डू , मिंटू अपने पिता के साथ रहकर कारोबार में हाथ बँटाता है और छोटा बेटा गुड्डू ब्याह के बाद से ही अपने माता-पिता से अलग गांव के पुश्तैनी मकान में रहकर खेती गृहस्थी तथा छड़ सीमेंट का व्यवसाय कर रहा है ।)
पत्नी के आग्रह और क्षुधा की पूर्ति हेतु सोहराई साव मुंह हाथ धोने लगे ।
कोशिला भोजन आदि के प्रबंध हेतु अंदर चली गई, गुरु बाबा वहीं पास पड़ी कुर्सी पर बैठकर उपदेश देने का उपक्रम करने लगे ।
परंतु सोहराई साव उन्हें बोलने का मौका दिए बिना स्वयं शुरू हो गए — बाबाजी आप तो सब जानते ही हैं , मेरे पास पहले क्या था ?10 बरस पहले कुंवर साहब चिरौरी विनती करने पर यही 3 डिसमिल जमीन दिए थे, जिस पर हम दोनों प्राणी दिन-रात मेहनत कर घर खड़ा किए है ।
नहीं तो और क्या था हमारे पास यहां टिकने का साधन ।वह तो पांडे बाबा के हाथ से नाहर वाला 5 डिसमिल जमीन का बोहनी हुआ जो हमारा किस्मत खुला ।
उसमें मिले साढे तीन हजार रुपयों से मैं जमीन का जो कारोबार शुरू किया सो अब तक हजारों लोगों को शहर में बसाने का पुण्य भी कमाया हूं ।इस घर का मुझे पचासों लाख रुपए देने के लिए लोग तैयार हैं
पर हम इ लक्ष्मीनिया के नहीं बेचेंगे बाबा ।उ त मिंटूवा के कपुतई से लोग इ कारोबार के सब राज़ जान गया नहीं तो डेली पाँच- छव केवाला हम करते थे।
अब तो सप्ताह में बड़ी मुश्किल से तीन चार केवाला हो पाता है वह भी बड़ी कम मार्जिन पर ।
हम बड़ी मेहनत से इसको पढ़ाए और यह दोस्ती- यारी के चक्कर में पड़कर लोगों को अपना पाटनर बना लिया ,अब उन लोग सब राज जान गया बाबा –।मिंटू दरवाजे के पीछे खड़े-खड़े अपने पिता की सारी बातें सुन रहा था, वह अपराध बोध से ग्रसित बाहर निकल कर बोला –
बाबूजी रजिस्ट्री के बड़ा बाबू कह रहे थे कि मिंटू जी आप पटना जाकर यह काम करिए वहां बहुत मुनाफा है ।
घर बनाने के लिए जमीन की तलाश में दूर-दूर से लोग आते हैं रैयत का पता नहीं चल पाने के कारण खुलेआम 30- 40 परसेंट कमीशन मिल जाता है सौदे में,मेरा अपना आदमी वहाँ है । हम भी दो पैसा आप के थ्रू कमा लेंगे ।मिंटू की बात सुन गुरु बाबा बोले अब कहां नहीं हैं बाबू !
‘दलाल ‘पटना में तो और बड़का बड़का हैं।
मेरा कहना मानो तो एक बार कौनो उपाय करके स्वर्ग पहुंच जाओ वहां पर इंद्र महाराज को खुश कर के हजार दो हजार एकड़ जमीन अपने नाम बंदोबस्त करा लो।
फिर यहां से जितने लोग जाएंगे सबको प्लॉटिंग कर कर के चार-चार पांच-पांच डिसमिल जमीन मनमाने रेट से बेचो ।यहां से स्वर्ग जाने वाले सभी लोग लगभग साफ सुथरा व्यवहार के ही होंगे इसलिए लेन-देन में भी हरहर कटकट नहीं होगी ।
गुरु बाबा की बात सुन सोहराई साव के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई मिंटू की ओर देखते हुए वे बोले- जावोगे ?मिंटू सर झुकाए मौन खड़ा रहा।
सोहराई साव खिन्नता के साथ गुरु बाबा से बोले –
क्या बताऊं बाबा जी हमको तो हमारा बाप घोघरा पढ़ाया नहीं , नहीं तो हम स्वर्ग क्या नर्क भी चले जाते लेकिन हम वहां की बोली भाषा तो नहीं ना समझ पाएंगे फिर जाकर क्या करेंगे ?
दोनों बेटा को जितना खर्चा और मेहनत करके हम पढ़ाए हैं वह हम ही जानते हैं ।
पर क्या फायदा ऐसी पढ़ाई का ?
इससे तो मेरे जैसा अनपढ़ ही अच्छा है न, हम क्या नहीं किए अपने उम्र में ।कोशिला भोजन का निमंत्रण लेकर उपस्थित थी ।
सभी लोग भोजन पर बैठे, सोहराई साव की थाली में रूखी रोटी और चटनी थी जबकि बेटे और गुरु बाबा लजीज व्यंजनों का स्वाद ले रहे थे ।
सोहराई साव उनकी थाली की ओर ललचाई नजरों से देखते हुए बोले –
शहर में घर बनाने का एक बड़ा नुकसान भी हुआ है बाबा !जब देखो तब कोई ना कोई आते रहता है, अब आ कर कोई ठहर जाए तो कैसे ना उसको भोजन देंगे ?
शहर की महंगाई देख ही रहे हैं , इसके बाद भी आदमी को अपने से कुछ नहीं बुझाता है। चले आते हैं मुंह उठाकर ।
इसको अपने ऊपर मत लीजिएगा ,हम हित -नात और गांव गीजार की बात कर रहे हैं ।यह पूर्णतः मौलिक अप्रकाशित एवं स्वरचित कहानी है जिसका किसी के व्यवसाय एवं जिंदगी से संबद्ध होना महज एक संयोग हो सकता है ।
✍रवि शंकर पाण्डेय ✍
रंका बौलिया, गढ़वा
झारखंड
