चाइनीज हलचल
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दुर्गम चोटी पर खड़े रणबांकुरे
देख रहे हैं चाइनीज हलचल
छ्याऊ- च्याऊ,चिं-चिं करते
मर्कट जैसी हरकत हर पलकुछ खिलौने चाईनीज वे
लाए हैं डराने को
‘बारूद ‘जो स्वयं ही है
छुर्छूरिया उन्हें दिखाने को ।ऐसा ही कर करके अब तक
शेखी बहुत बघारे हैं
आमने-सामने के चले युद्ध में
हर बार वे हारे हैं ।गीदड़ भभकी से डरा- डराकर
अपना काम चलाते हैं
शांत गंभीर सागर में वो
अपनी औकात दिखाते हैं
कुछ भीखमंगे देशों में
छीतरा कर थोड़े पैसे
शक्ति और अमीरी का
अपना धौंस दिखाते हैं।इस बार पड़ा है भारत के
दृढ़ नेतृत्व के पाले में
सैनिक उसके खामोश हुए
गिरकर गलवान के नाले में ।डोकलाम में मुंह की खाकर
चुशूल में आया फिर सर उठाकर
यहां भी पड़ी जब भीषण मार
राजनयिक वार्ता का तब किया पुकारदमित हैं उसके अपने नागरिक
तानाशाही शासन से
मानवाधिकार है कुचला हुआ
साम्यवादी कुशासन से
बस नेतृत्व भर रहा है दंभ
विश्व विजेता बनने का
नहीं है दम- खम कुछ भी उसमें
स्वयं से स्वयं संभलने का ।भारत का एक बड़ा प्रहार
देगा उसे करारी हार
हमने भी अब ठाना है
मानसरोवर पाना है
होगा अब अपना कैलाश
पूरी होगी वर्षों की आस ।✍रवि शंकर पाण्डेय ✍
रंका बौलिया, गढ़वा
झारखंड
