
अमीरी गरीबी
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अमीरी का अभाव गरीबी नहीं
संग्रहण की सुरसा अमीरी नहीं
भोजन वस्त्र और आवास
इस हेतु करते सब प्रयास
इसी को पाने के चक्कर में
आगे निकलने के टक्कर में
कुछ भोले और कम चतुर
रह जाते हैं पीछे छूट
लालची और चालाक
निकल लेते हैं सब को लूट ।
अतुष्टि के दलदल में
स्पृहा के जंगल में
जो भटक रहे हैं दिन- रैन
और ज्यादा और ज्यादा
हेतु रहते हैं बेचैन
वही दुनियाई अमीर हैं।
पर यह लौकिक भ्रम निराधार है
विलासिता और संपन्नता का
अर्थ से संबद्ध आधार है
यह सुख नहीं है जीवन का
आवश्यक इसमें सुधार है ।
लालसा से बड़ी है आत्मा
धन से बड़ा है मन
जो है इन दोनों से संपन्न
सुखी है उसका ही जीवन ।
अमीर बोतलों में पानी बेचता
गरीब सुधा पिलाता है
गरीब अन्न उत्पादित करता
अमीर ‘कुरकुरे’ बिकवाता है
मुट्ठी में संसाधन करके
अमीर अमीर कहलाता है
गरीब तन से श्रम लुटा कर
विपन्न गरीब बन जाता है
✍रवि शंकर पाण्डेय ✍
रंका बौलिया, गढ़वा
झारखंड