
वहां भी पैसे भिजवाना है
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एक-एक कर जहां जाते हैं सब
मुझको भी कभी जाना है
उन बादलों के पीछे दूर बहुत दूर
अपना प्यारा महल बनाना है
बेटे बेटियों के लिए किया इस जग में
अपना भी खूब नाम कमाया
धन दौलत कमा कर बढ़िया
जो दिखलाना था सब दिखलाया
अब वहां के लिए भी
सुख-सुविधा का प्रबंध करूं
पूर्वजों ने जो राह गही
मैं भी उसका अनुबंध करूं
जब भी जाऊं मैं वहां
उपस्थिति हो मेरी धमाकेदार
हवाला के जरिए ही सही
भेजूं अपना वैभव अपार
सोच रहा हूं दादा-दादी
और रघुवर काका को
उनके सब संगी साथी
साथ गगन के आका को
रुपयों से भरे कुछ थैले देकर
उन पर थोड़े एहसान जताऊँ
और बदले में वहां भी
यहां जैसा ही रुतबा पाऊं
उस राह का कोई पता बताओ
जिस राह जाता है धन
कुछ ले देकर मेरा भिजवाओ
शांत करो यह चिंतित मन
✍रवि शंकर पाण्डेय ✍
रंका बौलिया ,गढ़वा
झारखण्ड