अभिवृद्धि की ओर हिन्दी के बढ़ते हुए चरण*
हिन्दी अप्रतिम जीवनी-शक्तिवाली और संघर्षशील भाषा के रूप में उभरती हुई अपना मुक़ाम तय कर रही है । हमें अपनी भाषा से प्रेम और आत्मीयता विकसित करते हुए इसके सही उपयोग के प्रति सचेष्ट रहना चाहिये । यदि हमारी प्रतिबद्धता निरंतर सजग और उत्साही बनी रही तो वह दिन दूर नहीं, जब हमारी भाषा विश्व में सिरमौर होगी ।
हिन्दी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक और समर्थ भाषा है । यह संस्कृत की पौत्री और शौरसेनी अपभ्रंश की पुत्री है ।
हिन्दी की निराली विशेषताएँ :
1. हिन्दी ने संस्कृत वर्णमाला और बारहखड़ी को ही अपनाया है क्योंकि संस्कृत के स्वर- व्यंजनों का विधान अद्भुत और अन्यतम है । हिन्दी वर्णमाला का क्रम है – स्वर, व्यंजन और बारहखड़ी । किसी के भी मन मे यह जिज्ञासा सहज ही उठ सकती है ‘बारहखड़ी का अर्थ क्या है ?’
बारहखड़ी का अर्थ है,बारह मात्राओं का प्रयोग । ये 12 मात्राएँ हैं – आ,इ,ई,उ,उ,ॠ ,ए, ऐ, ओ, औ, अं और अ:
यद्यपि उस अर्थ में अं और अ: मात्राएँ नहीं हैं परन्तु बारहखड़ी में इन्हें मात्रा क्रम में रखा गया है, क्योंकि व्याकरण इन्हें अर्द्धस्वर मानता है ।
स्वर – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए ,ऐ, ओ , औ, अं अः
इसकी ध्वनियों का वर्गीकरण भी हमारे संस्कृत- मनीषियों ने बहुत सूझबूझ और दूरदर्शिता के साथ किया है। उन्होंने उच्चारण -स्थान के आधार पर ध्वनियों के पाँच वर्ग बनाए !
ये वर्ग हैं क् च् ट् त् प् जो निम्नानुसार हैं :
क् वर्ग – क् ख् ग् घ् ङ्
च् वर्ग – च् छ् ज् झ् ञ्
ट् वर्ग – ट् ठ् ड् ढ् ण्
त् वर्ग – त् थ् द् ध् न्
प् वर्ग – प् फ् ब् भ् म्
विशेष – ये ध्वनियाँ हैं अतः इन्हें हलन्त लगाकर दर्शाया गया है ।
इनके अतिरिक्त य् र् ल् व् श् ष् स् ह् । ये ध्वनियाँ भी विशिष्ट हैं । इनमें ‘य’ और ‘व ‘ अर्द्धस्वर , र प्रकंपित, ‘ल ‘ उत्क्षिप्त , ‘श्’ तालव्य , ‘ष’ मूर्धन्य , ‘स’ दन्त्य और ‘ह ‘ऊष्म ध्वनि है ।
क्+ष = ष, त्+र = त्र और ज्+ ञ = ज्ञ । संयुक्त वर्ण हैं ।
इन ध्वनियों में स्वर जुड़ता है ।स्वर से बिना जुड़े भी ध्वनि ‘वर्ण’ कहलाती है तथा स्वर जुड़कर भी ‘वर्ण’ कहलाती है । कुछ लोगों को वर्ण की परिभाषा को लेकर भ्रम है । इसे निर्मूल करने के विए ही यह बात समझाई गई है ।
2.हिन्दी की शब्द-संपदा भीअत्यधिक समर्थ है । यह संतोष की बात है कि हमारे सरकारी, अर्द्धसरकारी और निजी उपक्रमों के दैनंदिन कार्य-कलापों में हिन्दी का व्यवहार निश्चित रूप से बढ़ा है । हिन्दी का विकास अन्य भारतीय भाषाओं के साथ सहयोग-भाव अपनाने से और भी तीव्रतर होगा । इसलिए हमें हिन्दी में प्रादेशिक भाषाओं की शब्दावली का भी स्वागत करना चाहिए । उदाहरण के लिए ‘हड़ताल’ गुजराती भाषा का शब्द है जो हिन्दी ने अपनाया है । ऐसे कई शब्दों से हिन्दी समृद्ध हुई है । हिन्दी की समनावय -शक्ति अपूर्व है ।इसने कॢई भाषाओं के शब्दों को स्वयं में ऐसा आत्सात् कर लिया है कि लगता ही नहीं कि वे
शब्द इतर भाषाओं के हैं ।
3. शिरोरेखा का निराला विधान व वर्णों की गोलाईयुक्त सुन्दर आकृति –
4 . हिंदी की एक श्रेष्ठ विशेषता शिरोरेखा का प्रावधान है , साथ ही सुंदर गोलाईदार वर्ण इसके सौन्दर्य में चार चाँद लगाते हैं ।
5.जैसा उच्चारण है वैसा ही लिपि में लिखा जाना भी हिन्दी की अनुपम विशेषता है । मान धीजिए , किसी का नाम ‘दयालाल’ है और किसी का नाम ‘डाया लाल’ है तो हिन्दी में उच्चारण और पहचान का कोई संकट या भ्रम नहीं होगा । लेकिन अंगरेज़ी में भ्रम की स्थिति बन जाएगी ।
हिन्दी के लिए यह भी गर्व की बात है कि विदेशों में भी हिन्दी का पठन-पाठन और प्रसार निरंतर बढ़ता जा रहा है । हिन्दी हमारी शान है, हिन्दी हमारा गौरव है । यह जन-जनकी आशा और आकांक्षाओं का मूर्त्त रूप है और हमारी पहचान है । हमें इसे राष्ट्रभाषा के गौरव से विभूषित करने हेतु एकजुट होना होगा । आइए, हम हिन्दी के प्रसार के लिए कृतसंकल्प होकर एक स्वर से कहें कि हिन्दी हमारे माथे की बिन्दी है ।”हमें यह प्रण भी लेना होगा कि हम हिन्दी को अपने उस शीर्षस्थ स्थान पर प्रतिष्ठित कर दें कि हमें हिन्दी-दिवस मनाने जैसे उपक्रम न करने पड़ें और हिन्दी स्वतःस्फूर्त भाव से मूर्द्धाभिषिक्त हो ।
रविकान्त सनाढ्य
बी- 275 आर. के. कॉलोनी , भीलवाड़ा
राजस्थान ।