महावीर प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा हिंदी के लिए योगदान
हिंदी भाषा का विकास क्रम की बात करें तो यह एकदिन में नहीं हुआ,यह तो धीरे-धीरे पर क्रमश: होता गया सर्वप्रथम वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत ,पाली भाषा प्राकृत भाषा, अपभ्रंश तत्पश्चात अनुमानत: 1000 ई.के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ। अपभ्रंश से ही हिन्दी भाषा का उदय शनै-शनै हुआ। भक्तिकाल और रितिकाल में भी कर्णप्रिप अवधी और ब्रज भाषा का ही बोलबाला रहा,
इसी क्रम में 1850 से और 1900 के मध्य में भारतेंदु काल प्रारम्भ हुआ भारतेंदू हरिश्चंद्र जी इसके पुरोधा माने गए ,उन्होंने हिंदी के विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए
#निजभाषाउन्नतिअंहे सब ..उन्नति को मूल … काव्य भाषा की बात करें तो ब्रजभाषा ही प्रयुक्त होती रही थी,खड़ीबोली केवल गद्य तक ही सीमित रही । किन्तु इस युग के अंतिम दिनों में खड़ीबोली में कविता करने का आंदोलन प्रारंभ हो गया था. तथापि अभी तक कवियों के मन से ब्रजभाषा का मोह समाप्त नहीं हुआ था।
सन 1900 से और 1918 के कालखंड को द्विवेदी काल कहा जाता है,उन्होंने हिंदी गद्य की सही रूप में सेवा की, हिंदी भाषा उन्नत शिखर पर पहुंचाने के लिए आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान अविस्मरणीय है।
हिंदी नवजागरण की दिशा में महावीर प्रसाद द्विवेदी की सबसे बड़ी देन काव्यभाषा के रूप में खड़ी बोली हिंदी की प्रतिष्ठा करना रहा। गद्य और पद्य दोनों के लिए खड़ी बोली हिंदी को सर्वमान्य बनाने के साथ-साथ उन्होंने खड़ी बोली गद्य को व्याकरणसम्मत रूप भी दिया। एक मानक भाषा के रूप में उसे आकार प्रदान किया। हिंदी में विराम चिन्हों का प्रयोग भी द्विवेदी जी के प्रयासों की देन है।
1902 में श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी सरस्वती पत्रिका के संपादक बने जिसमें उन्होंने कवियों को खड़ी बोली में कविता लिखने के लिए प्रेरित किया और जो कविताएं भाषा का व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध हो उसे भी वह परिष्कृत करके और पत्रिका में छापे से इस प्रकार से उन्होंने खड़ी भाषा को काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया ..इसके परिणाम स्वरूप मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्या प्रसाद हरि “ओघ”, श्रीधर पाठक जैसे कवि राष्ट्रीय चेतना की मुख्यधारा से जुड़े, एवं भारत भारती, प्रिय प्रवास जैसे रचनाएं भारत का गौरव बनी।
हिंदी साहित्य की सेवा करने वालों में द्विवेदी जी का विशेष स्थान है। द्विवेदी जी की अनुपम साहित्य-सेवाओं के कारण ही उनके समय को द्विवेदी युग के नाम से पुकारा जाता है। श्री द्विवेदी जी ने हिंदी भाषा को नए नए विषयों से
सम्पन्न बनाया,हिंदी जगत उनके द्वारा किए किए गए इस उपकार को कभी नहीं भूलेगा।
श्रीकान्त दुदपुडी
रा०इ०का० गड़ीगांव पाबो जिला पौड़ी गढ़वाल
उत्तराखंड