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स्त्री पर ही लांछन क्यों लगाया जाता है?- प्रेम बजाज

स्त्री पर ही लांछन क्यों लगाया जाता है?

आज 21वीं सदी में भी हम 18वीं सदी की बातों में उलझे हैं, जब पर्दा प्रथा हुआ करती थी। आज के समय में स्त्री पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती है, और पुरुष भी घर के काम में स्त्री की मदद करते हैं, लेकिन बहुत कम ऐसा होता है कि कोई पुरुष किसी पुरुष को जोरू का गुलाम कहते, अक्सर स्त्रियां ही इस तरह के व्यंग्य करती है।
हमारी यही त्रासदी है कि अक्सर स्त्री ही स्त्री की दुश्मन बन जाती है । अगर कोई पुरुष नाइट ड्यूटी करता है तो बेचारा पूरी रात ड्यूटी करता है, और अगर कोई स्त्री नाइट ड्यूटी करें तो स्त्री ही कहेगी कि नाइट ड्यूटी नहीं करनी चाहिए, पता नहीं वहां कैसे- कैसे लोग होंगे, कुछ कहेंगी कि ना जाने वहां क्या-क्या करती होगी, अर्थात अगर कोई लड़की देर रात तक काम से आती है तो उसकी वर्जिनिटी पर भी शक किया जाता है। यदि किसी स्त्री को सहकर्मी के साथ हंसकर बात करते हुए देखे तो उस पर भी उंगली उठाई जाती है। ऐसी हल्की सोच को हमें बदलना होगा।
हां कुछ स्त्रियां होती है व्याभिचारिणी, व्यसनी , वो कहते हैं ना एक मछली सारा तालाब गंदा करती है, कुछ एक के ग़लत होने से सम्पूर्ण स्त्री जाति को बदचलन का तमगा क्यों दिया जाता है?
वैसे तो हम महिला दिवस तो कभी बालिका दिवस तो कभी महिला की पुरूषों से बराबरी की बातें करते हैं, कभी कोई स्पैशल महिलाओं को सम्मानित करने के लिए आयोजन करते है, लेकिन अगर एक महिला देर रात काम से घर लौटती है तो उसे बदचलन का तमगा दे देते हैं। क्या फायदा ऐसे महिला दिवसों का ?
केवल पर्दा प्रथा खत्म करने से या लिबास बदल लेने से हम आधुनिक नहीं बन सकते, हमें पुरूषों एवं स्त्रियों को अपनी इस घटिया सोच को भी बदलना होगा। विश्वास दिखाना होगा नारी पर, तभी हम पुरुष के बराबर खुद को खड़ा कर सकते हैं।केवल कहने भर से हम आधुनिक या बराबरी का हक या स्वतन्त्र या आज़ाद नही।
समाज हमसे अलग नहीं, हम ही समाज है, हम बदलेंगे तो समाज भी बदलेगा, समाज भी हम लोगों से मिलकर बना है। सबसे पहले एक औरत को औरत पर विश्वास करना होगा, जब हम खुद की बेटी को देर रात बाहर भेजने के लिए ये सोचेंगे कि ना जाने जहां ये जा रही है कैसा माहौल होगा, क्या हमारी बेटी सुरक्षित रह पाएगी या नहीं, तो हम औरों को कैसे कह सकते हैं कि स्त्री या बेटी का देर रात तक काम करना ग़लत नहीं। एवं जब भी कोई लड़के के लिए लड़की देखने जाते हैं तो ऐसे तोलमाल कर देखा जाता है कि लड़की दिखने में कैसी है, कहां जाॅब करती है, ड्यूटी से ज्यादा लेट तो नहीं आती, जैसे भाजी- तरकारी खरीदी जा रही हो, हमें अपनी बेटियों को भी स्ट्रांग बनाना होगा, और खुद को भी ।
“सोच बदलो, समाज बदलो”

मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)

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