दुःख में पुलकित हो तो जानें
बीत गईं पतझड़ की घड़ियां, अब बसंत मुस्काएगा,
रे मन, अब तो धीर धरो फिर, मन मधुमय हो जाएगा.
कल तक जो थे अपत-कंटीले, आज कोंपलें उन पर शोभित,
कलियां जैसे ही मुस्काईं, भौंरे हो जाएंगे मोहित.
मन-पंकज को दुःख की पंक से, पंकिल क्यों होने देते हो?
मुख-मंडल को म्लान कसक से, शंकित क्यों होने देते हो?
कण सम दुःख को समझ मेरु सम, क्यों भरते हो दुःख-उदधि को,
कैसे तैरेगी सुख-नैय्या, बहकेगी पतवार निधि तो?
सुख में तो सब हर्षित होते, दुःख में पुलकित हो तो जानें,
रैन-दिवस उजियार-तमस में, रहो एकरस तो हम मानें.
लीला तिवानी
नई दिल्ली