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माया

माया का काम है फंसाना, माया का अर्थ केवल धन से नहीं होता बल्कि जिस चीज में हमारा मन अटकता है, वही हमारे लिए माया हैI जैसे किसी का मन धन में अटकता है, किसी का भोग में, किसी का रूप में, किसी का शब्द में, किसी का स्वाद में, किसी का दुष्ट कर्मों में, किसी का अपने में और किसी का अपने वालों में आदि-आदि स्थानों या किसी एक स्थान पर भी यदि मन अटक जाता है तो वही उसके लिए माया हैI मन के माया में आते ही हमारी ऊर्जा बाहर की तरफ बहने लगती है जिससे आत्मा का ज्ञान नष्ट हो जाता है और व्यक्ति संसार में बंधने वाले दुष्ट कर्म करने लगता है जिससे मूढ़ता को प्राप्त हो जाता हैI
गुण माया को प्रकृति माया भी कहते हैंI गुण माया यह भगवान की शक्ति है, यह भगवान की शक्ति पाकर अपना काम करती हैI हम जीव (आत्मा) की शक्ति वाले हैं, हमारी शक्ति भगवान की शक्ति से कम है इसीलिए माया को हम नहीं हटा सकतेI इसीलिए हमें केवल भगवान की शरण में जाना होता हैI यह माया का प्रभाव हमारे मन पर होता है काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष एवं भह यह योग माया के कारण हम पर हावी हैंI वैसे तो जीव माया भी भगवान की शक्ति हैI लेकिन गुण माया जिसे योग माया कहते हैं, यह भगवान की अंतरंग शक्ति हैI अगर हम बहुत संक्षेप में माया के बारे में कहें तो हर वह चीज जो हम सुनते हैं, स्पर्श करते हैं, सोचते हैं, देखते हैं, बोलते हैं, सब माया हैI
माया शब्द का प्रयोग एक से अधिक अर्थों में होता हैI ऐसा प्रतीत होता है कि विचार में परिवर्तन के साथ शब्द का अर्थ बदलता गयाI जब हम किसी चकित कर देने वाली घटना को देखते हैं, तो उसे ईश्वर की माया कह देते हैंI यहाँ माया का अर्थ शक्ति हैI जादूगर अपनी चतुराई से पदार्थों को विपरीत रूप में दिखाता है, पदार्थों के अभाव में भी उन्हें दिखा देता हैI यह उसकी माया हैI यहाँ का अर्थ मिथ्या ज्ञान या ऐसे ज्ञान का विषय हैI मिथ्या ज्ञान दो प्रकार का है- भ्रम और मतिभ्रमI भ्रम में ज्ञान का विषय विद्यमान है परंतु वास्तविक रूप में दिखता नहीं, मतिभ्रम में बाहर कुछ होता ही नहीं, हम कल्पना को प्रत्यक्ष ज्ञान समझ लेते हैंI
भारतीय जीवन में दार्शनिक से लेकर सामान्य जन तक ‘माया’ शब्द का प्रयोग बड़े परिचित अंदाज में करता हैI भारतीय जनमानस में माया के अनेक अर्थ प्रचलित हैं- अज्ञान, आभास, धोखा, जादूगरी, धूर्तता, जादू-टोना, इंद्रजाल इत्यादिI वास्तव में ‘माया’ संस्कृत भाषा का एक सारगर्भित शब्द हैI पूरे विश्व में इस शब्द का पर्याय नहीं हैI यह माया शब्द ‘मा’ धातु से बना हैI जो नापा जाता है वह माया हैI इस प्रकार माया एक मानदण्ड हैI इस तरह हम यह कह सकते है कि माया का अर्थ है जो मोह को प्राप्त करता हैI यह केवल धन को प्राप्त करना माया नहीं है किसी भी रूप में हो सकता है धन, भोग, बुरे कर्म, किसी स्वाद के लिए भी हो सकता हैI माया मानव को अपनी तरफ आकर्षित करती है जिसमें मानव जल्दी ही फस जाता है यही तो माया हैI वर्तमान में भी यह समस्या प्रचलित है मानव जीवन आधुनिक होता जा रहा है जिसके कारण मानव माया और मोह में अधिकतर फंसता जा रहा हैI इसी तरह वर्तमान समय में इन बातों पर विचार-विमर्श करने और समझने-समझाने की जरुरत है तांकि आने वाली पीढ़ी को इन समस्याओं से बचाया जा सकेI अध्ययन करने से हमें वर्तमान समस्याओं का परिचय मिलता है और एक नई चेतना भी पैदा होती है साहित्य इन समस्याओं का निराकरण करने के लिए सबसे बड़ा साधन हैI साहित्य में ही मानव का जन्म होता हैI
माया को परतंत्र माना गया है, जबकि प्रकृति को स्वतंत्रI माया का आश्रय ब्रह्म या जीव होता है, परंतु प्रकृति को अपने अस्तित्व के लिए किसी दूसरी सत्ता की अपेक्षा नहीं करनी पड़तीI प्रकृति यथार्थ है, जबकि माया अयथार्थ हैI वर्तमान में हर मानव इसी माया के मोह में ही घूम रहा हैI माया ने जैसे उसे बंधी बना लिया है मानव को आज माया तह करती है क्या करना है कहाँ जाना हैI इसी कारण मनुष्य अपनी अस्मिता खो बैठता हैI वर्तमान जीवन विसंगतियों से भरा दिखाई देता है समय के साथ आधुनिक होना बुरी बात नहीं है लेकिन इतना भी आधुनिक नहीं होना चाहिए मानव अपनी अस्मिता को भूल जायेI हमें अच्छे जीवन के लिए आधुनिक भी होना पड़ता है ऐसा नहीं है की हम सौ वर्ष पहले जैसे थे वैसे ही रहें, समय के साथ अच्छा जीवन हर मानव चाहता है लेकिन सोच-समझकर ही आधुनिक होना चाहिए तांकि हमारी संस्कृति और संस्कार भी वैसे ही बने रहेंI
यह गुणमयी देवी दुरत्यया माया मेरी हैI यह माया क्योंकि गुणमयी है, इसलिए हर कोई उससे मोहित होता हैI इसी माया की अचिंत्य शक्ति से लोग मुझे यानी मूल को भूल गये हैं और ब्याज को ही सब कुछ मान बैठे हैंI कुछ समय के लिए ब्रह्म जैसे भारी भरकम शब्द को भूल जाएँ, और यह मानें की अपने सौरमंडल के आगे दूर-दूर तक किसी नियम से बंधा एक अछूता सम्प्रत्यय है, जिसे परमसत्ता कहा जा सकता हैI उसी परमसत्ता के अधीन अपना सौरमंडल है, जिसका ध्रुव केन्द्र अपना सूर्य हैI यह सूर्य अक्षय ऊर्जा के कारण पृथ्वी पर उगते और मुरझाते हैंI यहाँ यह बात का ज्ञान होना आवश्यक बात है कि इसे अपर प्रकृति नाम से पुकारा जाता है, जबकि परा प्रकृति पूरे खगोल में व्याप्त परमसत्ता हैI हम जिस अपरा सत्ता के अधीन हैं, उसमें तीन मौलिक गुण घुले-मिले हैं, इन गुणों को सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण कहते हैंI जब हम शांत एवं स्वस्थ अर्थात स्वयं में स्थित होते हैं, तब हमारे भीतर सतोगुण काम कर रहा होता हैI जब हम किसी को प्रभावित करना अथवा किसी अन्य को आतंकित करना चाह रहे होते हैं तो हमें रजोगुण आन्दोलित कर रहा होता है और जब कभी हम क्रोध में आकर हिंसक हो उठते हैं, तब हम तमोगुण की गिरफ्त में होते हैंI
कोई भी मानव कभी भी किसी एक स्थिति में नहीं होता और न ही रह सकता हैI न ही हम हमेंशा शांत रह पाते हैं, और न ही हम हर समय क्रोध में होते हैं इसलिए हमें यह मान लेने में कोई उलझन नहीं होनी चाहिए की हम इन तीन गुणों का समुच्चय हैं और हम यदि चाहें भी तो इन तीन गुणों से पार नहीं जा सकतेI क्योंकि जो अपरा प्रकृति बाहर काम कर रही है वही हमारे भीतर भी यही काम करने में व्यस्त हैI यदि परमसत्ता के अतिरिक्त कहीं कुछ नहीं तो यह तीन गुण आये कहाँ से और उनमे मोहित होने वाले जीव कहाँ से आये, इसके बारे में हम यही कह सकते हैं की परम सत्ता पहले स्वयं मोहित हुई और तब उसी ने हम सबको मोहित कियाI इस सामूहिक सम्मोहन को नाम मिला ‘माया’I पूरा दोष माया का भी नहीं है, मानव के भीतर लगातार उत्पात करने वाली उस कल्पना का भी दोष है, जो परम सत्ता की तस्वीर बनी इस माया को असल मान बैठी है और समस्त भूमंडल को नाच नचा रही हैI इस तरह हम यह कह सकते है कि माया के जाल में मानव वर्तमान में अधिक फंसता जा रहा हैI माया के प्रति मोह वर्तमान समय में देखने को मिल रहा है हर एक आदमी माया के पीछे दौड़ रहा हैI इसी कारण ही मानव का ध्यान दूसरी वस्तुओं जिनमें उसका स्वार्थ है उसी तरफ केवल आकर्षित हो रहा हैI यही कारण है कि आज हमारी पीढ़ी अपनी अस्मिता को भूल रही है और केवल अपने स्वार्थ के लिए काम कर रही हैI मोह, काम, क्रोध, स्वार्थ, बजारवाद ने वर्तमान समय में सभी को अपनी तरफ आकर्षित किया हैI यह सभी माया के ही अंग है केवल माया ही नहीं स्वार्थ, मोह, भोग, दुष्ट कर्म यह भी माया ही हैI
मानव जो है वहीं नहीं रहना चाहता वह किसी न किसी खोज में लगा ही रहता है, प्रकृति के द्वारा दिए गये साधनों से संतुष्ट न रहकर अपने जीवन को और सुखद बनाने के लिए नित्य नवींन प्रयास करता हैI आदमी अपने अधूरेपन से अवगत है, इसीलिए पूर्णता चाहता हैI उसे प्रारम्भ से ही अमरत्व की तलाश हैI वह यह तो जानता है कि भूख से उसका कोई छुटकारा नहीं है, इसलिए वह काम करता है मगर इस प्रक्रिया में उसके भीतर बार-बार यह प्रश्न घूमता है कि वह जीवन किस लिए धारण किये हैंI यही चेतना मानव को कुछ नया करने के लिए सुचेत करती हैI लेकिन इस चपेट में मानव यह भी भूल जाता है कि उसकी संस्कृति और प्रकृति को कोई क्षति पहुँच रही है या नहींI ऐसा नहीं है की हम सौ वर्ष पहले जैसे थे आज भी वैसे ही रहें बदलाव आना बुरी बात नहीं है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हम अपने जीवन की अच्छी तलाश में यह भी भूल जाएँ कि हम अपनी अस्मिता को खो रहे हैंI इस तरह मानव इस माया में फस जाता हैI केवल धन के लिए काम करने से ही माया का प्रयोग नहीं होगा किसी भी स्वार्थ के लिए जब हम काम करते हैं तो हम माया के जाल में फस जाते हैंI
केवल धन, स्वार्थ और मोह से हमें अमरता प्राप्त नहीं होती, यह सब तो केवल हम अपने लिए करते हैं सच्चा देशभक्त वही है जो सभी के लिए सोचता है देश के लिए सोचता है, खुद जागृत होता है और अपने ज्ञान से सभी को जागृत करता हैI अब मैं संन्यास लूँगा तुम मीर सम्पति को आपस में बाँट लो तो मैत्रेयी ने कहा आप जो धन मुझे देंगे उससे क्या इश्वर मिलेगा, क्या मुझे धन से अमरता मिलेगी, याज्ञवल्क्य का दो टूक उतर पूरी पूँजीवादी सभ्यता पर एक थप्पड़ की तरह आज तक प्रतिध्वनित हो रहा हैI याज्ञवल्क्य का उतर था धन से अमरता मिलने की कोई आशा नहींI माया का काम है फंसना चाहे वह किसी भी रूप में मानव को आकर्षित करती हैI तब से ही हमारी ऊर्जा बाहरी वस्तुओं के प्रति बढ़ने लगती है और हमारा ज्ञान नष्ट होने लगता हैI माया किसी भी रूप में हमें आकर्षित कर सकती है अधिकतर लोग माया केवल धन को ही मान लेते है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हैI किसी वस्तु, भोग, दुष्ट कर्म, किसी स्वाद के प्रति आकर्षित होना भी तो माया हैI वर्तमान में यह समस्या बहुत अधिक प्रचलित हैI इसी समस्या का हमारी भक्ति और दर्शन पर भी प्रभाव पड़ रहा है जिसको हम अपने विचारों के द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं तांकि यह समस्याओं के बारे में आने वाले समय में हम सुचेत हो जाएँ और इन समस्याओं से छुटकारा पा सकेI जब तक हम इन बातों पर चर्चा करते हुए इनको नहीं समझ पाते तब तक इन समस्याओं से छुटकारा पाना असंभव हैI इसलिए यहाँ माया को लेकर हमारा उद्देश्य यही है कि माया क्या है और इनसे कैसे बचा जा सकता हैI 21वीं सदी में माया के प्रति अपने विचार आपके समक्ष प्रस्तुत किये जिनका अध्ययन करते हुए आने वाले समय में इन समस्याओं का ज्ञान सभी को मिलेI साहित्य से हम ज्ञान प्राप्त करते है साहित्य बहुत बड़ा उपादान है जो इन समस्याओं का निराकरण कर सकता हैI यह भक्ति और दर्शन के प्रमुख तत्व है माया और जीवI इन बातों से यदि मानव को छुटकारा मिलेगा तभी तो हमारी दृष्टि देश के प्रति और राष्ट के प्रति जागरुक होगीI ज्ञान वह है जो सभी में बाँटा जाए तभी तो हम जागृत होंगेI इस तरह हमें माया के जाल से निकलना है तभी हम अच्छा जीवन व्यतीत कर सकते हैंं।

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